नई दिल्‍ली. कोरोना महामारी की दूसरी लहर के बाद आई एक फंगस की महामारी ने सबको भयभीत कर दिया है. कई राज्‍यों में कोरोना के मरीजों में सबसे पहले सामने आई म्‍यूकरमाइकोसिस यानि ब्‍लैक फंगस को महामारी भी घोषित कर दिया गया है. वहीं अब कोरोना के कई वैरिएंट की तरह इसके भी अलग-अलग प्रकार सामने आ रहे हैं.

ब्‍लैक, व्‍हाइट और येलो फंगस के बाद अब मध्‍य प्रदेश के जबलपुर में क्रीम फंगस का एक मामला सामने आया है. जिससे लोगों में फंगस के रंगों को लेकर भी एक डर पैदा हो गया है. हालांकि हेल्‍थ एक्‍सपर्ट का कहना है कि सामने आ रहे फंगस के प्रकारों से भयभीत होने की कोई जरूरत नहीं है. ये फंगस की अलग-अलग प्रजातियां हैं. हालांकि सिर्फ एक फंगस है जो काफी खतरनाक है.

सरोजनि नायडू मेडिकल कॉलेज आगरा में माइक्रोबायोलॉजी डिपार्टमेंट की हेड प्रोफेसर और लैब नोडल ऑफिसर डॉ. आरती अग्रवाल ने न्‍यूज18 हिंदी से बातचीत में बताया कि देशभर में फंगस को रंगों के हिसाब से पहचान रहे हैं या डॉक्‍टर उसी हिसाब से बता रहे हैं. हालांकि मेडिकल में इनके लिए ऐसे कोई रंग निर्धारित नहीं हैं. सभी फंगस अलग-अलग प्रजातियां हैं और अलग-अलग प्रभाव दिखाती हैं.

ये है सबसे जानलेवा फंगस

देशभर में ब्‍लैक फंगस के मामले बढ़ रहे हैं. हालांकि इसी दौरान व्‍हाइट या येलो फंगस के भी मामले सामने आए हैं.

देशभर में ब्‍लैक फंगस के मामले बढ़ रहे हैं. हालांकि इसी दौरान व्‍हाइट या येलो फंगस के भी मामले सामने आए हैं.

ब्‍लैक और व्‍हाइट फंगस के बाद पहले येलो फंगस आई और अब क्रीम फंगस का नाम लिया जा रहा है. इनकी मारक क्षमता को लेकर भी लोगों में डर है. जबकि देखा जाए तो सिर्फ म्‍यूकरमाइकोसिस, जिसे कि ब्‍लैक फंगस नाम दिया जा रहा है, सिर्फ यही एक जानलेवा फंगस है. यह इसलिए है कि इसमें फंगस आंखों को खत्‍म करती हुई ब्रेन और ब्‍लड वैसल्‍स तक चली जाती है और शरीर को भारी नुकसान पहुंचाती है.

इसलिए रंगों से पहचान रहे फंगस का प्रकार

डॉ. आरती कहती हैं माइक्रोबायोलॉजी के अनुसार इन सभी फंगसों के नाम अलग-अलग हैं. इनकी श्रेणी रंगों से तय नहीं होती है. हालांकि ये कह सकते हैं कि इन्‍हें रंगों के अनुसार सिर्फ इसलिए जान रहे हैं क्‍योंकि जब ये शरीर पर प्रभाव डालती हैं तो उसका परिणाम उस रंग में आता है. जैसे ब्‍लैक फंगस होने पर ब्‍लड वैसल्‍स को ब्‍लॉक करते हुए जहां ये पहुंचती है वहां टिश्‍यू का रंग काला हो जाता है और वह इलाका भी काला पड़ जाता है. इसके साथ ही नाक या मुंह से काला तरल बाहर आता है. साथ ही इसके लक्षण भी हैं, जिनसे इसे पहचाना जा सकता है. जबकि व्‍हाइट फंगस में हाइफी या फिलामेंट सफेद होता है. कल्‍चर में जो कैंडिडा पैदा होता है वह भी सफेद होता है. इसके साथ ही मुंह से सफेद दही जैसा एक पदार्थ आने लगता है, इसीलिए इसे व्‍हाइट फंगस आम लोगों को समझाने के लिए कह रहे हैं.

व्‍हाइट फंगस वास्‍तव में कुछ नहीं करता है. वहीं येलो और क्रीम फंगस लगभग एक जैसे ही हैं.  इनका भी खतरा लोगों को न के बराबर रहता है.

सिर्फ इन मरीजों को है फंगस का सबसे बड़ा खतरा

जिनकी डायबिटीज नियंत्रित नहीं हो पा रही, ब्‍लैक फंगस या अन्‍य किसी फंगस का भी खतरा उन्‍हीं को ज्‍यादा है. बाकी स्‍टेरॉयड से लेकर जो भी कारण इन फंगसों के बताए जा रहे हैं वे अभी तक साबित नहीं हुए हैं. जिन मरीजों का ब्‍लड शुगर 300-400 से ऊपर है और दवाएं देने के बाद भी कम नहीं हो रहा है तो उन्‍हें फंगस का खतरा सबसे ज्‍यादा है. होता यह है कि स्‍टेरॉयड लेने से ऑक्‍सीजन डिप कर जाता है. साथ ही एक बड़ी बात है कि म्‍यूकरमाइकोसिस को बढ़ने के लिए भी स्‍टेरॉइड चाहिए, जिससे वह आसानी से ग्रो कर जाता है. मरीज का पैनक्रियाज इंसुलिन बनाना कम कर देता है जिससे शुगर लेवल बढ़ जाता है. तभी समस्‍या पैदा हो जाती है.

ब्‍लैक फंगस के इलाज की है कमी, इसलिए भी होती हैं मौत  

प्रो. आरती कहती हैं कि ब्‍लैक फंगस का इलाज भी इसकी मृत्‍यु दर बढ़ने का एक बड़ा कारण है. सभी फंगसों की दवाएं उपलब्‍ध हैं. इनसे घबराने की कोई जरूरत नहीं है लेकिन म्‍यूकरमाइकोसिस के लिए इन्‍जेक्टिबल एम्‍फो बी लाइपोजोमल चाहिए जिसकी कि कमी है. यही वजह है कि ऑपरेशन करने के बाद भी अगर म्‍यूकरमाइकोसिस के मरीज को दवा नहीं मिलती तो उसे बचा पाना मुश्किल हो जाता है.

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