अहमदाबाद. अहमदाबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने बुधवार को इशरत जहां, जावेद शेख उर्फ प्राणेश पिल्लई और दो अन्य के साथ जून 2004 में हुए एनकाउंटर (Ishrat Jahan Encounter Case) मामले में तीन आरोपियों को बरी कर दिया. गुजरात सरकार द्वारा तीन आरोपी पुलिस अधिकारियों – आईपीएस अधिकारी जीएल सिंघल, सेवानिवृत्त  डिप्टीएसपी तरुण बरोत और एक सहायक उप-निरीक्षक अनाजू चौधरी पर मुठभेड़ मामले में मुकदमा चलाने से इनकार करने के बाद यह फैसला आया है. तीनों के खिलाफ कार्रवाई ना किये जाने के फैसले के बाद ट्रायल व्यावहारिक रूप से खत्म हो गया.

यह अंतिम तीन पुलिसकर्मी थे जिन पर हत्या, आपराधिक साजिश, अपहरण और 19 साल की लड़की को अवैध हिरासत में रखने का आरोप लगा था. इस मामले में मुम्ब्रा की 19 वर्षीय लड़की इशरत जहां, उसके साथी जावेद शेख उर्फ प्राणेश पिल्लई, जीशान जौहर और अमजद अली राणा को 15 जून 2004 को अहमदाबाद के बाहरी इलाके में एक पुलिस मुठभेड़ में गोली मार दी गई थी.

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने 20 मार्च को अदालत को सूचित किया था कि राज्य सरकार ने तीनों आरोपियों के खिलाफ अभियोग चलाने की मंजूरी देने से इनकार कर दिया है

8 आरोपियों के खिलाफ था मामलासीबीआई के वकील आरसी कोडेकर ने शनिवार को विशेष सीबीआई जज वीआर रावल को सीआरपीसी की धारा 197 के तहत अभियोजन स्वीकृति ना देने की जानकारी दी. उन्होंने राज्य सरकार द्वारा  एक सीलबंद कवर में सीबीआई को भेजे गए पत्र भी अदालत के समक्ष रखा.

यह मामला एक सत्र अदालत में आठ आरोपियों के खिलाफ दायर किया गया था. अभियुक्त पुलिस और शिकायतकर्ता में से एक, जेजी परमार की कार्रवाई के दौरान मृत्यु हो गई. सीबीआई द्वारा आरोप पत्र दायर किए जाने तक एक कमांडो मोहन कलासवा का भी निधन हो गया था.

यह अधिकारी भी हो चुके हैं बरी
राज्य सरकार द्वारा अभियोजन स्वीकृति से इनकार करने के बाद 2019 में सेवानिवृत्त डीआईजी डीजी वंजारा और एसपी एनके अमीन को मामले में बरी किया था. इससे पहले अदालत ने इस मामले में पूर्व प्रभारी डीजीपी पीपी पांडे को बरी कर दिया था.

केंद्र ने पूर्व विशेष निदेशक, राजिंदर कुमार सहित चार इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारियों के लिए इस मामले में अभियोजन स्वीकृति की अनुमति देने से इनकार कर दिया था. इसके बाद अदालत ने मंजूरी के अभाव का हवाला देते हुए उनके खिलाफ दायर पूरक आरोप पत्र को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था.

पुलिस का दावा था कि मुठभेड़ में मारे गए चारो लोग आतंकवादी थे और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने की योजना बना रहे थे. हालांकि, हाईकोर्ट द्वारा गठित विशेष जांच टीम इस निष्कर्ष पर पहुंची की मुठभेड़ फर्जी थी, जिसके बाद सीबीआई ने कई पुलिस कर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज किया.

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