माओ (Mao Zedong) के बाद चीन के सबसे प्रभावशाली राष्ट्रपति माने जा रहे शी जिनपिंग (Xi Jinping) ने सत्ता में आने के बाद 2013 में चीन को समुद्र में सबसे बड़ी शक्ति (Naval Force) के तौर पर खड़ा करने की बात कही थी. अपने इरादों को शक्ल देते हुए 2015 में जिनपिंग ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को वर्ल्ड क्लास फोर्स बनाने के लिए कई तरह के प्रोजेक्ट शुरू किए. इस पूरी कवायद का नतीजा यह हुआ कि 2015 से अब तक का सफ़र कम से कम चीनी नेवी (Chinese Navy) के लिए बहुत ताकतवर साबित हुआ और चीन न केवल सबसे बड़ी समुद्री सेना (Largest Naval Force) बन गया है, बल्कि उसके और बड़े होने के इरादों से अमेरिका के पसीने छूटे हुए हैं.

जिनपिंग ने चीन को सबसे बड़ी समुद्री सेना बनाने के आक्रामक कदमों की शुरूआत 2015 में जब की थी, तब अमेरिका की एजेंसी नेवल इंटेलिजेंस ऑफिस (ONI) ने साफ तौर पर भांप लिया था कि 2020 तक चीन दुनिया की सबसे बड़ी नेवी बन सकता है. यही नहीं, इस एजेंसी ने अमेरिका को इस बारे में खबरदार करते हुए सार्थक कदम उठाने के बारे में भी सुझाव भी दिए थे. आइए अब आपको बताते हैं कि चीन और अमेरिका के बीच यह होड़ कहां तक पहुंच गई है और आगे क्या माहौल नज़र आ रहा है.

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कितनी बड़ी है चीनी समुद्री फोर्स?पीएलए की नेवी के बेड़े में 2015 में 255 जंगी जहाज़ थे और ONI के अनुमान की मानें तो 2020 के आखिर तक चीन के लिए यह आंकड़ा 360 तक पहुंच चुका है यानी अमेरिका की तुलना में 60 से भी ज़्यादा जंगी जहाज़ चीन के पास हो चुके हैं. इतना ही नहीं, चीन इस बढ़त को और जारी रखते हुए अगले चार सालों यानी 2025 तक 400 जंगी जहाज़ों के लक्ष्य के पीछे दौड़ रहा है.

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जंगी जहाज़ों के मामले में अमेरिका से आगे निकल गया चीन.

क्या सच में अमेरिका छूट गया पीछे?
समुद्री ताकत को क्या केवल जंगी जहाज़ों की संख्या से ही आंका जा सकता है? पूरी तरह तो नहीं, लेकिन यह एक बड़ा पहलू होता है. फिर भी अगर कोर ताकत की बात की जाए तो अमेरिका अभी बहुत नहीं पिछड़ा है बल्कि कुछ मोर्चों पर तो अब भी आगे दिख रहा है. जैसे समुद्री पोत, पारंपरिक सबमरीन और विनाशकों की बात हो तो अमेरिका और चीन की ताकत में बहुत अंतर नहीं है.

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दूसरी तरफ, अमेरिकी नेवी के पास 10 एयरक्राफ्ट कैरियर ऑपरेशन में हैं, जो कि चीन की तुलना में अमेरिका की शक्ति को बढ़त देने वाला पहलू है. इसी तरह, अगर कुल एक्टिव ड्यूटी कर्मचारियों और हथियारों की संख्या देखी जाए तो अमेरिका ही आगे है. चीन की तुलना में न्यूक्लियर शक्ति वाली सबमरीनों और सतह वाले जहाज़ों पर मिसाइल सेल के मामले में भी अभी अमेरिका आगे ही है.

चीन के क्या हैं मंसूबे?
दुनिया भर के लिहाज़ से चीन का समुद्र में बड़ी ताकत के तौर पर उभरना चिंता का विषय रहा है क्योंकि यह अमेरिका को सीधे तौर पर चुनौती देने वाली कवायद है. दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में कई देशों के साथ सीमा विवादों में उलझा हुआ चीन अगर विशाल नेवी फोर्स के तौर पर उभरता है तो साफ तौर पर ताईवान के लिए सबसे बड़ा खतरा पैदा होता है, जिस देश को चीन अपनी ही सीमा बताता है.

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समुद्र में चीन और अमेरिका के बीच वर्चस्व की लड़ाई बदस्तूर जारी है.

दूसरे विश्व युद्ध की जीत के 75 साल के मौके पर पिछले साल अमेरिका ने अपनी त्रि-शक्ति रणनीति की घोषणा करते हुए साफ तौर पर कहा भी था कि चीन को वह लॉंग टर्म खतरे के तौर पर देख रहा है. सीएनएन की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक जापान के साथ भी द्वीप को लेकर चीन का सीमा विवाद है, जो नेवल फोर्स के साथ ही वास्ता रखता है.

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अब रणनीतिक तौर पर ताईवान, जापान या कोरिया के साथ चीन के जो समुद्री और ज़मीनी सीमा विवाद चल रहे हैं, वहां दुनिया की सबसे बड़ी नेवल फोर्स को बतौर धमकी इस्तेमाल करते हुए चीन दबदबे की चाल चलने के मूड में आ सकता है. वहीं, यह भी तय है कि दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर के क्षेत्रों में अमेरिका अपने साथी देशों के साथ जो समुद्री वर्चस्व रखता है, उसका जवाब देना भी चीन के एजेंडे में शामिल बताया जा रहा है.





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