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विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) और चीन ने मिलकर कोरोना वायरस की शुरूआत को लेकर जो जांच की, 9 फरवरी को उसका निष्कर्ष बताया गया कि फ्रोज़न फूड से वो वायरस मनुष्यों में (Virus Came From Frozen Food) फैला, जो दुनिया भर में महामारी बन गया. अब इस दावे में कितनी सच्चाई है? यह जानने की कोशिश करते हुए सबसे पहले जांच टीम (Investigation Team) का तर्क सामने आता है कि चीन के वुहान स्थित हुआनान मार्केट (Wuhan Wet Market) में फ्रोज़न जानवरों की खरीद-फरोख्त होती रही है. यह वही जगह है, जहां से कोरोना फैलने की शुरूआत मानी जाती रही.

जांच टीम की अगुवाई करने वाले पीटर बेन एंबारेक ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि यह तो सभी जानते हैं कि कोविड 19 फैलाने वाला वायरस ठंडे माहौल में सर्वाइव कर सकता है, लेकिन यह समझा नहीं जा सका है कि वायरस मनुष्यों में कैसे फैल सकता है. लेकिन समझने की बात यह है कि इसी तरह की थ्योरी चीनी मीडिया में लंबे समय से रही कि चीन ने किसी देश से फ्रोज़न एनिमल आयात किए, जिनसे वायरस फैला.

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वुहान का चर्चित हुआनान मार्केट.

इस दावे को इस तरह भी समझा जाना चाहिए क्योंकि विशेषज्ञ अब तक इस बात से सहमत नहीं हैं कि फ्रोज़न फूड में वायरस इस तरह सर्वाइव कर सके कि संक्रमण फैल सके. यूके की यूनिवर्सिटी में मानवीय वायरोलॉजी के विशेषज्ञ लॉरेंस यंग की मानें तो ‘ऐसे किसी रास्ते से वायरस मनुष्यों तक पहुंचा हो, इसकी संभावना बहुत बहुत कम, तकरीबन न के बराबर होगी.’

लेकिन क्यों है विवाद?

चीन और WHO की जांच का दावा एक तरफ और यंग का तर्क दूसरी तरफ. तो यंग इसकी वजह इस तरह बताते हैं कि SARS-CoV-2 वायरस इस तरह का वायरस है, जिस पर फैट और लिपिड मेम्ब्रेन का एक कवर होता है, जो मनुष्यों की कोशिकाओं में संक्रमण फैलाने में अहम होता है. लेकिन यही कवर ठंडक या बर्फ के संपर्क में आने पर इतना कमज़ोर हो जाता है या हट जाता है, तो वायरस संक्रमण फैलाने लायक नहीं रह जाता.

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इस तर्क में कितना है दम?

सिर्फ यूके के यंग ही नहीं बल्कि चीन में भी इस तर्क से कई विशेषज्ञ सहमत हैं. चीन की एक यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने भी अपनी स्टडी में साफ कहा कि फ्रोज़न फूड से वायरस फैलने की थ्योरी में कई गैप्स नज़र आते हैं. -10°C से -20°C तक तापमान हो तो डेटा के मुताबिक कोरोना वायरस ज़्यादा देर सर्वाइव नहीं कर पाता और यही तापमान फ्रोज़न फूड के ट्रांसपोर्ट के दौरान आम होता है.

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लेकिन, एक स्टडी में फ्रोज़न फूड की थ्योरी को बल भी मिला. इस स्टडी के मुताबिक रिसर्चरों ने पोर्क, चिकन और मछली में वायरस डाला गया और 21 दिनों तक इस फूड को 4°C से -20°C के बीच लैब में फ्रीज़ किया गया. देखा गया कि वायरस लोड कम नहीं हुआ. हालांकि इस स्टडी से यह नहीं पता चला कि वायरस लोड तो वैसा ही रहा लेकिन क्या यह मनुष्यों को संक्रमित करने लायक रहा?

ट्रांसपोर्ट में कैसा रहता है तापमान?

फ्रोज़न फूड को जब ट्रांसपोर्ट किया जाता है तो SARS-CoV-2 के सर्वाइवल के लिए तापमान बेहद कठिन हो जाता है. हवाई ट्रांसपोर्ट के दौरान तापमान -20°C और -30°C के बीच चला जाता है. वहीं, समुद्री ट्रांसपोर्ट के समय वायरस को सॉल्टी एयर का सामना करना पड़ता है. लीसेस्टर यूनिवर्सिटी के जूलियन टैंग के हवाले से न्यू साइंटिस्ट की रिपोर्ट कहती है कि ह्यूमिडिटी के कारण भी फ्रोज़न फूड में कोरोना वायरस के बने रहने पर निगेटिव असर पड़ता है क्योंकि ऐसी हवा से उसकी लिपिड मेम्ब्रेन नष्ट होती है.

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कॉंसेप्ट इमेज

इसी तरह की बात टेक्सस स्टेट यूनिवर्सिटी के रॉडनी रोड ने भी कही कि फ्रोज़न फूड की पैकेजिंग पर अगर वायरस पाया भी जाए तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह हमारी कोशिकाओं को संक्रमित करने की ताकत भी रखता है.

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फिर कैसे फैला वायरस?

अब अगर यह किसी तरह मान भी लिया जाए कि वुहान के हुआनाना मार्केट में फ्रोज़न फूड से मनुष्य के पास यह वायरस पहुंचा होगा तो भी कई सवाल खड़े हो जाते हैं. यंग फिर तर्क चाहते हैं कि मार्केट से लिये जाने के बाद उस फूड को पकाया गया होगा, तो वायरस कैसे बचा होगा? हमारे पेट में गैस्ट्रिक एसिड से वायरस कैसे बच गया होगा? ऐसे में आपको यह दावा भी करना होगा कि कच्चा फूड बेचा गया और उसे कच्चा ही खा लिया गया.

कुल मिलाकर WHO ने चीन के साथ मिलकर जांच में चीन को ​क्लीन चिट देने के लिए जो थ्योरी पेश की है, विशेषज्ञ मान रहे हैं कि उस थ्योरी के सच होने की संभावना बेहद कम है.



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