प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी ख़ास भाषण शैली के लिए जाने जाते हैं. चुनाव प्रचार हो या मन की बात जैसे कार्यक्रम या फिर किसी और सामाजिक, राजनैतिक अवसर पर उनका भाषण हो या फिर संसद में कुछ बोलना हो, तो वे पूरी तैयारी से आते हैं और विरोधियों को भी शांति से अपनी बात सुनने को मजबूर कर देते हैं. कोई शक नहीं कि आज की राजनीति में शब्दों और बोलते समय उनके इस्तेमाल की कला में माहिर चंद राजनेताओं में वे आगे की कतार में खड़े नज़र आते हैं. आजकल उनके मुंह से निकले एक शब्द को लेकर सोशल मीडिया पर बहुत गहमागहमी है. वह शब्द है आंदोलनजीवी.

राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई बहस के जवाब में प्रधानमंत्री ने कहा कि लोग श्रमजीवी, बुद्धिजीवी जैसे शब्दों से तो परिचित हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से देश में नई जमात पैदा हुई है- आंदोलनजीवी. किसी भी वर्ग का आंदोलन हो, यह जमात हर जगह नज़र आती है. ये पूरी टोली आंदोलन के बिना जी नहीं सकती और आंदोलन से ही जीने के रास्ते खोजती रहती है. … ऐसे परजीवी लोगों से राष्ट्र की रक्षा करनी होगी. मोदी का भाषण पूरा होने से पहले ही देश के मीडिया ने आंदोलनजीवी शब्द को लपक लिया. सोशल मीडिया पर यह ट्रेंड करने लगा. तब से ही आंदोलनजीवी शब्द को लेकर क्रिया-प्रतिक्रिया का दौर जारी है.

मोदी विरोधी कुछ लोगों ने ट्विटर पर अपने नाम के आगे आंदोलनजीवी लिख दिया, तो आम आदमी पार्टी ने ट्वीट पर मोदी के पुराने ट्वीट शेयर करने में देर नहीं लगाई. पार्टी ने कैप्शन में लिखा- ब्लास्ट फ्रॉम द पास्ट. मोदी विरोधी कुछ पत्रकारों ने भी आंदोलनजीवी शब्द की आलोचना की और यह बताने का प्रयास किया कि आंदोलन के असली माइने क्या हैं. उन्होंने यह भ्रामक विमर्श फिर से खड़ा करने की कोशिश की कि आरएसएस को आंदोलन पसंद नहीं हैं और स्वयंसेवकों ने आज़ादी की लड़ाई के लिए हुए आंदोलनों में हिस्सा नहीं लिया.

जबकि सही तथ्य यह है कि 1925 में आरएसएस की स्थापना के कई साल बाद तक डॉ. हेडगेवार कांग्रेस में सक्रिय थे. उन्होंने स्वयंसेवकों से हर आंदोलन में भाग लेने का आदेश दिया था. इतना ही नहीं, महात्मा गांधी ने 1934 में महाराष्ट्र के वर्धा में स्वयंसेवकों के एक शिविर में जाकर उनके अनुशासन और छुआछूत न मानने पर तारीफ़ की थी. कई साल बाद दिल्ली में गांधी जी स्वयंसेवकों को संबोधित किया, तब भी उन्होंने वर्धा शिविर का ज़िक्र किया था. बहरहाल, कुछ कथित बुद्धिजीवियों ने हर सूरत में मोदी विरोध की आदत बना ली है. वे हर समय मोदी विरोध का टोकरा सिर पर लादे रहते हैं. ऐसे ही लोग सोशल मीडिया पर महात्मा गांधी तक को आंदोलनजीवी करार दे रहे हैं.

दलितों के हितों के वादे के साथ राजनीति में आए गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवानी ने भी ट्वीट किया कि सत्याग्रह में असली आंदोलनजीवी डॉ आंबेडकर जैसे आंदोलनजीवी बनो…. अब बड़ा सवाल यह है कि क्या महात्मा गांधी और डॉ भीमराव आंबेडकर जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों को आज के परिप्रेक्ष्य में आंदोलनजीवी करार किया जा सकता है? क्या आज के किसान आंदोलन की तुलना भारत की आज़ादी की लड़ाई से की जा सकती है? मेरी राय में तो हरगिज़ नहीं. पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत कुछ राज्यों के महज़ 40-41 किसान यूनियनों के आंदोलन को देशव्यापी आंदोलन नहीं कहा जा सकता. दिल्ली की सीमाओं पर जुटे कथित आंदोलनकारियों ने राजधानी दिल्ली और पूरे एनसीआर में रहने वाले क़रीब तीन करोड़ लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी मुश्किल बना दी है, इस वजह से आम इंसान की कोई सहानुभिति अब आंदोलन के प्रति नहीं रह गई है. शुरुआत में ऐसा नहीं था.

महात्मा गांधी का व्यक्तित्व पूरे विश्व के लिए प्रेरणादायी है. दुनिया में ऐसा कौन सा शीर्ष नेता है, जो महात्मा गांधी का नाम आदर से नहीं लेता? दक्षिण कोरिया जैसे एकाध तानाशाह देशों को छोड़ दें, दुनिया के रह देश के सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता गांधी जी के वचन या उनके लेख कभी न कभी कोट ज़रूर करते रहते हैं. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि आज़ादी की लड़ाई विदेशियों के विरोध में विदेशियों से ही लड़ी गई थी. आज़ादी की लड़ाई का श्रेय किसी एक पार्टी या संगठन को नहीं दिया जाना चाहिए. किसानों समेत समाज का हर वर्ग देश को स्वतंत्र कराने के लिए आंदोलनरत था. वह पूरे भारत की लड़ाई थी, जिसका नेतृत्व महात्मा गांधी कर रहे थे. अगर हम मौजूदा किसान आंदोलन की तुलना महात्मा गांधी के स्वतंत्रता के लिए चलाए गए आंदोलनों से करते हैं, तो हम उनका अपमान ही करेंगे. इससे महात्मा का क़द छोटा ही होगा. इस तरह राष्ट्रपिता के अपमान की इजाज़त नहीं दी जा सकती. यही बात हम डॉ भीमराव आंबेडकर के बारे में कहेंगे.

किसान आंदोलन के ज़रिए भारत के विरोध में अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र की परतें खुल रही हैं. देश को तोड़कर खालिस्तान बनाने के दिवास्वप्न देखने वाली काली ताक़तों के किसान आंदोलन में शामिल होने के पुख़्ता सुबूत मिलने लगे हैं. तो ऐसे में क्या हम आज़ादी की लड़ाई के लिए हुए आंदोलनों की तुलना मौजूदा किसान आंदोलन से कर सकते हैं? अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर कुछ भी अनर्गल मत लिखिए. सोचिए-समझिए, तभी अपनी बात सोशल मीडिया पर कहिए. यह आकलन अवश्य करिए कि कहीं मोदी विरोध के मद में चूर होकर आप निर्विरोध रूप से महापुरुषों को छोटा तो नहीं बना रहे हैं? (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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