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कोरोना के बढ़ते संक्रमण के बीच अस्पतालों में बेड की कमी के कारण इस समय हर कोई अपनी सांस को सुरक्षित करने में लगा है। होम आइसोलेशन में रहने वाले ज्यादातर संक्रमित इस बात से डर रहे हैं कि कहीं उनका ऑक्सीजन लेवल 92 से नीचे न आ जाए। विशेष परिस्थितियों से पार पाने के लिए संक्रमित या उनके परिजन घरों में ऑक्सीजन जुटा कर रख रहे हैं। इससे ऑक्सीजन की सप्लाई करने वालों के यहां सुबह से लेकर शाम तक भीड़ देखी जा रही है। यही वजह है कि इन दिनों जिले में ऑक्सीजन की डिमांड और कालाबाजारी दोनों बढ़ गई है। 

जिले में कोरोना का संक्रमण बढ़ने के साथ ही ऑक्सीजन की मांग भी बढ़ती जा रही है। अस्पतालों में बेड नहीं हैं, लिहाजा लोग अपनी या अपने रिश्तेदारों की जिंदगी को बचाने के लिए ऑक्सीजन स्टोर कर रहे हैं। ऑक्सीजन के लिए बहुत से लोग सीएमओ से लेकर डीएम तक गुहार भी लगा रहे हैं। बस यही कह रहे हैं कि किसी तरह ऑक्सीजन की व्यवस्था हो जाए। उसके बाद जब बेड खाली होंगे तो वे भर्ती हो जाएंगे।

इसी वजह से नैनी से लेकर गौहनिया तक तीनों ऑक्सीजन प्लांटों से तकरीबन दो से हजार लोग सुबह से लेकर शाम तक ऑक्सीजन लेने के लिए लाइन लगाए खड़े रहते हैं। लेकिन वहां से सीधे लोगों को सप्लाई बंद होने से ऑक्सीजन की कालाबाजारी तेज हो गई है। 10 किलोग्राम ऑक्सीजन के लिए मनमाना पैसा वसूला जा रहा है। मरीजों के परिजनों का कहना है कि जिंदगी से बड़ा पैसा नहीं है। लोग अपने पास ऑक्सीजन के छोटे सिलिंडर से लेकर बड़े सिलिंडर तक रख रहे हैं। इसके अलावा लोग नए-नए सिलिंडर भी बनवा रहे हैं, जिससे वे ऑक्सीजन भराकर रख लें और उन्हें जब भी जरूरत पड़े उसका इस्तेमाल कर लें। 

रोजाना पड़ रही 40 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की जरूरत
कारोना का संक्रमण बढ़ते ही जिले में इस समय तकरीबन 35 से 40 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की जरूरत पड़ रही है। एडिशनल सीएमओ डॉ. वीके मिश्रा के मुताबिक ऑक्सीजन की सप्लाई के लिए तीन अलग-अलग प्लांट संचालित हैं। एक तो परेरहाट, जिसकी प्रतिदिन उत्पादन की क्षमता 20 मीट्रिक टन है, लेकिन अभी यह 16 मीट्रिक टन ही उत्पादन कर रहा है। जबकि दूसरा प्लांट इम्पीरियल एंड सतीश्वर है। इसकी क्षमता कुल 40 मीट्रिक टन ह,ै लेकिन सिलिंडर की कमी के चलते यहां केवल छह मीट्रिक टन उत्पादन हो रहा है।

इसी तरह रीवा रोड स्थित गौहनिया में भी सहज एयर ऑक्सीजन प्लांट है। इसकी भी क्षमता 20 मीट्रिक टन है, लेकिन सिलिंडर की कमी के चलते यहां भी दो मीट्रिक टन का ही उत्पादन हो पा रहा है। इसके अलावा बुधवार से तेलियरगंज में परेर हाट की एक और इकाई शुरू होने की उम्मीद है। उसके चालू होने से चार मीट्रिक टन ऑक्सीजन का उत्पादन होने लगेगा। इससे 28 मीट्रिक टन का उत्पादन निजी इकाइयों द्वारा होने लगेगा। एसआरएन में इंटरनल ऑक्सीजन के दो प्लांट चल रहे हैं। दोनों प्लांट से 20 मीट्रिक टन का उत्पादन हो सकता है। लेकिन संसाधनों की कमी के चलते इतना उत्पाद नहीं हो पा रहा है। लिहाजा, यहां भी निजी प्लांटों से दो से तीन मीट्रिक टन की आपूर्ति हो रही है। इस वजह से कोरोना काल में ऑक्सीजन की डिमांड तकरीबन तीन गुना बढ़ गई है। 

बोकारो से 17 मीट्रिक टन आई ऑक्सीजन
जिले में ऑक्सीजन की बढ़ती मांग को देखते हुए शासन ने जिले के लिए 17 मीट्रिक टन ऑक्सीजन बोकारो से भेजी है। यह ऑक्सीजन देर रात शहर पहुंच गई। एडिशनल सीएमओ डॉ. वीके मिश्रा ने बताया कि ऑक्सीजन की बढ़ती मांग को देखते हुए इसे बाहर से मंगाया गया है। शनिवार को भी 11 मीट्रिक टन ऑक्सीजन बाहर से आई थी। उन्होंने बताया कि जब तक इसकी मांग रहेगी तब तक ऑक्सीजन आती रहेगी।

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कोरोना के बढ़ते संक्रमण के बीच अस्पतालों में बेड की कमी के कारण इस समय हर कोई अपनी सांस को सुरक्षित करने में लगा है। होम आइसोलेशन में रहने वाले ज्यादातर संक्रमित इस बात से डर रहे हैं कि कहीं उनका ऑक्सीजन लेवल 92 से नीचे न आ जाए। विशेष परिस्थितियों से पार पाने के लिए संक्रमित या उनके परिजन घरों में ऑक्सीजन जुटा कर रख रहे हैं। इससे ऑक्सीजन की सप्लाई करने वालों के यहां सुबह से लेकर शाम तक भीड़ देखी जा रही है। यही वजह है कि इन दिनों जिले में ऑक्सीजन की डिमांड और कालाबाजारी दोनों बढ़ गई है। 

जिले में कोरोना का संक्रमण बढ़ने के साथ ही ऑक्सीजन की मांग भी बढ़ती जा रही है। अस्पतालों में बेड नहीं हैं, लिहाजा लोग अपनी या अपने रिश्तेदारों की जिंदगी को बचाने के लिए ऑक्सीजन स्टोर कर रहे हैं। ऑक्सीजन के लिए बहुत से लोग सीएमओ से लेकर डीएम तक गुहार भी लगा रहे हैं। बस यही कह रहे हैं कि किसी तरह ऑक्सीजन की व्यवस्था हो जाए। उसके बाद जब बेड खाली होंगे तो वे भर्ती हो जाएंगे।

इसी वजह से नैनी से लेकर गौहनिया तक तीनों ऑक्सीजन प्लांटों से तकरीबन दो से हजार लोग सुबह से लेकर शाम तक ऑक्सीजन लेने के लिए लाइन लगाए खड़े रहते हैं। लेकिन वहां से सीधे लोगों को सप्लाई बंद होने से ऑक्सीजन की कालाबाजारी तेज हो गई है। 10 किलोग्राम ऑक्सीजन के लिए मनमाना पैसा वसूला जा रहा है। मरीजों के परिजनों का कहना है कि जिंदगी से बड़ा पैसा नहीं है। लोग अपने पास ऑक्सीजन के छोटे सिलिंडर से लेकर बड़े सिलिंडर तक रख रहे हैं। इसके अलावा लोग नए-नए सिलिंडर भी बनवा रहे हैं, जिससे वे ऑक्सीजन भराकर रख लें और उन्हें जब भी जरूरत पड़े उसका इस्तेमाल कर लें। 



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