अवतारों और नायकों के देश भारत में अनेक ऐसी आदर्श और चमत्कारी विभूतियों ने जन्म लिया जिन्हें हज़ारों बरसों की सभ्यता में मनुष्य ने मूल्यों की तरह स्वीकार कर लिया. सूर्यवंशी श्रीराम की चरित गाथा भी भारतीय मानस में ऐसी ही स्थाई भाव की तरह रच- बस गयी है. यहां राम की देवता छवि से हटकर उनके मानवीय जीवन के उन सरोकारों से प्रेरणा का सन्दर्भ जुड़ता है जहां वे अपने हिस्से में आयी हर भूमिका और चुनौती का पूरी आतंरिक शक्ति से सामना करते हैं और समाधान की राहें खोजते हैं.

देखने वाली बात यह कि वाल्मीकि और तुलसी के राम जाने कितने अध्यायों और प्रसंगों में नयी व्याख्याओं के साथ कितनी ही पीढ़ियों के लिए जीवन, कर्म और चिंतन का आधार बन गए हैं. अपनी कृति “साकेत” में मैथिलीशरण गुप्त कहते हैं – ‘राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाए सहज सम्भाव्य है’. निराला जैसा हिंदी का अप्रतिम कवि ‘राम की शक्ति पूजा’ के चरम पर राम के मुख से कहते हैं – “आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर”.

हाल ही दिवंगत हुए हिंदी के प्रख्यात लेखक नरेंद्र कोहली ने अपने अनेक व्याख्यान और निबंधों में राम से जुड़े घटना प्रसंगों की चर्चा करते हुए सांसारिक जीवन के हर मोर्चे पर उन्हें अनुकरणीय बताया है. चैत्र की नवमी याने राम के जन्म का यह अवसर धार्मिक आस्था और भावनाओं के उमड़ते उत्सव से हटकर इस दिशा में सोचने का मौका भी है कि आज के दौर में हमारी नैतिक शक्ति और मर्यादाओं का वजन कितना शेष रह गया है? राम की पूजा का देश अपने भीतर रामत्व की कितनी रक्षा कर पा रहा है?

“पल-पल है भारी वो विपदा है आई, मोहे बचाने अब आओ रघुराई”…. राम नाम जैसे दुःख के अंधेरों को दूर कर देने के समान है. चाहे जीवन कितनी ही कठिनाइयों के दौर से गुज़र रहा हो, राम नाम जपने से मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों का सामना करने का साहस हमें मिल जाता है, लेकिन इसकी वजह क्या है?

दरअसल हमारे साहित्य में श्रीराम को लिखा ही इस प्रकार गया है. राम का उल्लेख न सिर्फ एक ऐसे चरित्र के रूप में किया जाता है जो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भय को दूर कर आशा के दीपक जलाकर समस्याओं के समाधान की राह भी दिखता है. शायद यही कारण है कि समस्याओं के बादलों से घिरे होने पर अनायास ही “राम नाम” ही गूंज उठता है.

यूं देखा जाए तो भारत और राम जैसे एक दूसरे के पर्याय हैं और भारतीय परिवेश में राम के चरित्र की प्रमुख पहचान है. राम का जीवन एक ऐसी कथा है जो उन्हें किसी भी दौर की परिस्थितियों में महानायक बनता है. विश्व में शायद ही कोई ऐसा लोकप्रिय, महान और प्रेरणा दायी चरित्र होगा जिसके नाम से किसी से मिलने पर “राम-राम” का संबोधन निकलता हो. शायद ही कोई ऐसा किवदंती-पुरुष होगा जिस पर एकाग्र कोई महाकाव्य, मात्र धार्मिक रूप से या ऐतिहासिक रूप से ही महत्वपूर्ण नहीं हो, बल्कि जीवन में आने वाली छोटी-बड़ी समस्याओं से लड़ने की प्रेरणा भी देता हो.

वाल्मीकि ने राम कथा को संस्कृत में लिख कर राम पर केंद्रित पहली कृति रची. वहीं, तुलसीदास ने सोलहवीं शताब्दी में “श्री रामचरित मानस” जैसा महाकाव्य लिख कर राम को घर-घर पहुंचाया. राम की कहानी और उनके मर्यादा पुरुषोत्तम वाले स्वभाव को केंद्रित कर ही तुलसीदास ने अपनी काव्य-कृतियां लिखीं. यहां गौर करने लायक पंक्तियां हैं जो राम के अयोध्या वंश की छवि प्रस्तुत करती हैं-

“काहे रामजिउ सांवर, लछिमन गोर हो।
कीदहुं रानि कौसलहि परिगा भोर हो।।
राम अहहिं दसरथ कै लछिमन आन क हो।
भरत सत्रुहन भाइ तौ श्रीरघुनाथ क हो ।।”

राम के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक की विचारधाराओं का समावेश है. राम के साहित्य में उन मूल्यों को स्थापित किया गया जो कई युगों तक प्रासंगिक हों तथा लोक के लिए प्रेरणा का स्रोत बने. विश्व के महान राजनीतिज्ञ और विचारक राम के महान जीवन और नैतिक मूल्यों का पालन कर अपने पथ की ओर अग्रसर रहे हैं. जॉर्ज ग्रियर्सन, जे.एम्. मैक्सफाई, फादर कामिल बुल्के आदि जैसे विद्वान अलग-अलग रूपों में राम के चरित्र से अत्यंत प्रभावित थे. राम के चरित्र का युगों-युगों तक प्रासंगिक होने का कारण आलोचक और कवि मनोज श्रीवास्तव के एक आलेख “राम जो निष्पाप रहे” में देखने को मिलता है. वे कहते हैं कि – राम ने जीवन में उस भूमिका को स्वीकार नहीं किया जो समाज ने उन पर थोपी थी. उन्होंने कैकेयी के वरों में अपनी एक नयी पहचान निर्मित करने का अवसर देखा. उन्होंने राजवंश को यह मौका नहीं दिया कि वह उन्हें परिभाषित करे. उन्हें अपने चरित की स्थापना करनी थी. वे वंशगत विरासत को स्वीकार कर लेते तो उसके साथ उन सीमाओं को भी ढोते. राम को अपना एक व्यक्तित्व खुद रचना था.

“राम ही तो करुणा में हैं, शान्ति में राम हैं
राम ही हैं एकता में, प्रगति में राम हैं
राम बस भक्तों नहीं, शत्रु के भी चिंतन में हैं
देख तज के पाप रावण, राम तेरे मन में हैं
राम तेरे मन में हैं, राम मेरे मन में हैं
राम तो घर घर में हैं, राम हर आंगन में हैं
मन से रावण जो निकाले, राम उसके मन में हैं”

‘स्वदेस’ फिल्म में जावेद अख्तर द्वारा का लिखा गया यह गीत, राम के रोम-रोम में बसे होने का विचार साझा होता है. राम भक्त हनुमान ने भी अपना सीना चीर कर राम के होने का प्रमाण दिया था. यह सर्वविदित है कि राम कण-कण में बसे है और इसीलिए वह हर एक के प्रिय हैं. वह लोक नायक हैं. लोक उनकी गाथा को याद कर मुश्किल समय में प्रेरणा लेता हैं. और क्यों न हों, राजवंश के होने के बावजूद अपने पिता के आदेश पर सब कुछ त्याग कर साधु जीवन जीने को निकल पड़े थे. हर परिस्थिति का सामना, बिना डरे, डट कर किया, हार नहीं मानी. हमेशा सत्य, साहस, त्याग, न्याय और पराक्रम के परचम लहराए, लेकिन उसके साथ ही अपने व्यक्तित्व से लगातार प्रेम, दया, करुणा को कभी अलग नहीं होने दिया. राम वह नायक हैं जिनका शत्रु भी उनके हाथों संहार के बाद उनका नाम लेता हुआ अपने प्राणों को त्याग गया.

कहने का अर्थ है कि राम अलग-अलग वर्ग के लोगों के लिए अलग-अलग रूप में मान्य हैं. एक वर्ग के लिए राम जहां आस्था और आराधना की मूरत हैं, तो वहीं दूसरे वर्ग के लिए वह मर्यादा पुरुषोत्तम व नीति विद पराक्रम के रूप में मान्य हैं. राम हमारी रक्षा के प्रतीक हैं, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रमाण हैं. एक उम्मीद हैं, कि असत्य पर सत्य की जीत निश्चित है. इससे यह प्रमाणित होता है कि राम न सिर्फ हर दौर में प्रासंगिक हैं बल्कि हर वर्ग के लिए भी किसी न किसी तरह आदर्श का प्रतीक हैं. रामायण को न सिर्फ टीवी धारावाहिकों के रूप में बल्कि सिनेमा जगत में भी अलग-अलग तरह से रूपांतरित किया गया है. रामलीला को बड़े शहरों से लेकर गांव और कस्बों में आयोजित किया जाता है, जिसमें आज भी भारी संख्या में लोग उमड़ते हैं. राम के जीवन मूल्य इस तरह न सिर्फ साहित्य बल्कि रंगमंच के ज़रिये जनमानस तक पहुंचते हैं.

संस्कृति चिंतक और कवि आचार्य विष्णुकांत शास्त्री कि यह कविता बताती है कि आस्था किन मनोभावों को सुंदरता से अभिव्यक्त करती है – ‘देते हो सम्मान, तुम्हारी कृपा राम जी, कभी-कभी अपमान, तुम्हारी कृपा राम जी, दोनों में सम रह पाऊं मैं सहज भाव से, मुझको दो वरदान तुम्हारी कृपा राम जी’.

ब्लॉगर के बारे में

विभोर उपाध्यायलेखक, संगीतकार

बदलते संदर्भों, विषयों और वैचारिक मुद्दों पर नए सोच का लेखन. कंटेंट राइटर्स के रूप में अनेक उपक्रमों के साथ काम. युवा संगीतकार.

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