अंत्येष्टि के बाद सिराने के लिए रखे फूल को दिखाते गिरीश चंद्र सिन्हा
– फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

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जिन शवों को अपने हाथ लगाने को नहीं होते तैयार, उनका खुद अंतिम संस्कार करते हैं गिरीश चंद्र
होनी की परवाह किए बगैर अप्रैल और मई में ऐसे 20 से ज्यादा शवों का कर चुके हैं अंतिम संस्कार

बरेली। आईवीआरआई के तकनीकी सहायक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद 76 की उम्र पार कर चुके गिरीश चंद्र सिन्हा खुद भी नहीं बता पाते हैं कि बरसों पहले श्मशान भूमि का एकांत उन्हें क्यों रास आने लगा लेकिन इतना जरूर कहते हैं कि कोरोना संक्रमण से जान गंवाने वालों के शवों के पास आने से उनके ही परिवार वालों को कन्नी काटते देखा तो उनका श्मशान आना सार्थक हो गया। होनी की परवाह किए बगैर उन्होंने ऐसे लोगों की चिता सजाकर खुद मुखाग्नि देनी शुरू कर दी। अप्रैल और मई में उन्होंने ऐसे 20 शवों को मुखाग्नि दी।
पुराना शहर में बालजती कुआं के पास रहने वाले गिरीश चंद्र सिन्हा 2006 में आईवीआरआई से सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने बताया कि सेवानिवृत्त के बाद जब कभी भी मन विचलित होता था, वह गुलाबबाड़ी श्मशान भूमि चले जाते थे। श्मशान भूमि के एकांत वातावरण में आत्मचिंतन करते थे तो शांति मिल जाती थी। आए दिन श्मशान भूमि पर उन्हें निठल्ला बैठा देखकर प्रबंध कमेटी के लोगों ने रोक-टोक शुरू की तो उन्होंने उसकी सदस्यता ले ली। गिरीश बताते हैं कि कोरोना के दौर में इस बार उन्होंने श्मशान भूमि पर ऐसे नजारे देखे हैं जिन्हें वह शायद मरते दम तक नहीं भूल पाएंगे।
गिरीश चंद्र सिन्हा बताते हैं कि अप्रैल में जब कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या बढ़ी तो उन्होंने तमाम लोगों को अपने संक्रमित परिजन के शव को श्मशान भूमि के पास रखकर चुपचाप लौट जाते देखा। कई बार शव लेकर आए लोग घंटों इंतजार करते रहते थे कि अंत्येष्टि करने के लिए कोई भाड़े पर मिल जाए। संक्रमण के खौफ से खुद शव को हाथ लगाने को तैयार नहीं होते थे। अप्रैल में ही एक दिन देर रात तीन लोग एक शव को लेकर आए और श्मशान भूमि पर छोड़कर चले गए। उस समय वहां सिर्फ एक कर्मचारी मौजूद था। वह पहला शव था जिसके लिए उन्होंने खुद चिता सजाकर मुखाग्नि दी। इसी के साथ फैसला कर लिया कि ऐसे सभी शवों को वह मुखाग्नि देंगे, कोरोना के डर से जिनके अपने ही बेगाने बन गए हैं। अप्रैल और मई में वह अब तक ऐसे 20 शवों को मुखाग्नि दे चुके हैं।

परिवार संक्रमित हुआ तब भी सेवा से नहीं डिगे

गिरीश के परिवार में नौ लोग हैं। उन्होंने बताया कि अप्रैल के आखिर में उनकी पत्नी-बच्चे, भाई-भतीजे सभी एक साथ संक्रमित हो गए। उन्होंने भी जांच कराई लेकिन वह निगेटिव निकले। इस दौरान भी वह श्मशान भूमि पर सेवा करते रहे। कोई शव अंत्येष्टि के इंतजार में रखा न रहे, इसलिए सुबह आठ से रात आठ बजे तक श्मशान भूमि में ही रहते थे। इसके बाद अपने परिवार का हालचाल लेते थे। गिरीश चंद्र का मानना है कि पूरा परिवार संक्रमित होने के बावजूद कोरोना ने उन्हें नहीं छुआ, यह ईश्वर की ही देन थी।

जिन शवों को अपने हाथ लगाने को नहीं होते तैयार, उनका खुद अंतिम संस्कार करते हैं गिरीश चंद्र

होनी की परवाह किए बगैर अप्रैल और मई में ऐसे 20 से ज्यादा शवों का कर चुके हैं अंतिम संस्कार

बरेली। आईवीआरआई के तकनीकी सहायक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद 76 की उम्र पार कर चुके गिरीश चंद्र सिन्हा खुद भी नहीं बता पाते हैं कि बरसों पहले श्मशान भूमि का एकांत उन्हें क्यों रास आने लगा लेकिन इतना जरूर कहते हैं कि कोरोना संक्रमण से जान गंवाने वालों के शवों के पास आने से उनके ही परिवार वालों को कन्नी काटते देखा तो उनका श्मशान आना सार्थक हो गया। होनी की परवाह किए बगैर उन्होंने ऐसे लोगों की चिता सजाकर खुद मुखाग्नि देनी शुरू कर दी। अप्रैल और मई में उन्होंने ऐसे 20 शवों को मुखाग्नि दी।

पुराना शहर में बालजती कुआं के पास रहने वाले गिरीश चंद्र सिन्हा 2006 में आईवीआरआई से सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने बताया कि सेवानिवृत्त के बाद जब कभी भी मन विचलित होता था, वह गुलाबबाड़ी श्मशान भूमि चले जाते थे। श्मशान भूमि के एकांत वातावरण में आत्मचिंतन करते थे तो शांति मिल जाती थी। आए दिन श्मशान भूमि पर उन्हें निठल्ला बैठा देखकर प्रबंध कमेटी के लोगों ने रोक-टोक शुरू की तो उन्होंने उसकी सदस्यता ले ली। गिरीश बताते हैं कि कोरोना के दौर में इस बार उन्होंने श्मशान भूमि पर ऐसे नजारे देखे हैं जिन्हें वह शायद मरते दम तक नहीं भूल पाएंगे।

गिरीश चंद्र सिन्हा बताते हैं कि अप्रैल में जब कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या बढ़ी तो उन्होंने तमाम लोगों को अपने संक्रमित परिजन के शव को श्मशान भूमि के पास रखकर चुपचाप लौट जाते देखा। कई बार शव लेकर आए लोग घंटों इंतजार करते रहते थे कि अंत्येष्टि करने के लिए कोई भाड़े पर मिल जाए। संक्रमण के खौफ से खुद शव को हाथ लगाने को तैयार नहीं होते थे। अप्रैल में ही एक दिन देर रात तीन लोग एक शव को लेकर आए और श्मशान भूमि पर छोड़कर चले गए। उस समय वहां सिर्फ एक कर्मचारी मौजूद था। वह पहला शव था जिसके लिए उन्होंने खुद चिता सजाकर मुखाग्नि दी। इसी के साथ फैसला कर लिया कि ऐसे सभी शवों को वह मुखाग्नि देंगे, कोरोना के डर से जिनके अपने ही बेगाने बन गए हैं। अप्रैल और मई में वह अब तक ऐसे 20 शवों को मुखाग्नि दे चुके हैं।

परिवार संक्रमित हुआ तब भी सेवा से नहीं डिगे

गिरीश के परिवार में नौ लोग हैं। उन्होंने बताया कि अप्रैल के आखिर में उनकी पत्नी-बच्चे, भाई-भतीजे सभी एक साथ संक्रमित हो गए। उन्होंने भी जांच कराई लेकिन वह निगेटिव निकले। इस दौरान भी वह श्मशान भूमि पर सेवा करते रहे। कोई शव अंत्येष्टि के इंतजार में रखा न रहे, इसलिए सुबह आठ से रात आठ बजे तक श्मशान भूमि में ही रहते थे। इसके बाद अपने परिवार का हालचाल लेते थे। गिरीश चंद्र का मानना है कि पूरा परिवार संक्रमित होने के बावजूद कोरोना ने उन्हें नहीं छुआ, यह ईश्वर की ही देन थी।



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